Bilaspur news -"यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन सभी कर्मचारियों के लिए मिसाल है, जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस रखते हैं""7 साल की लंबी न्यायिक लड़ाई के बाद मिला""न्याय,,, खबर ज़रूर पूरा पढ़े,,,,
शेख असलम की रिपोर्ट,,,,
7 साल की लंबी लड़ाई के बाद मिला न्याय: जेल प्रहरी उमराव सिंह ठाकुर की सेवा बहाली का रास्ता साफ
बिलासपुर/अंबिकापुर:कभी एक साधारण जेल प्रहरी के रूप में अपनी ड्यूटी निभाने वाले उमराव सिंह ठाकुर के जीवन में एक ऐसा दौर आया, जिसने उन्हें न्याय की लंबी और कठिन राह पर ला खड़ा किया। लेकिन आखिरकार उनकी हिम्मत, धैर्य और न्यायपालिका पर विश्वास ने उन्हें जीत दिलाई।
साल 2009 में उमराव सिंह ठाकुर ने जेल प्रहरी के पद पर भर्ती होकर अपनी सेवा की शुरुआत की। वे नियमित रूप से अपने कर्तव्यों का पालन करते रहे और समय-समय पर अवकाश लेकर अपने परिवार के साथ भी समय बिताते रहे। सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन एक पारिवारिक परिस्थिति ने उनकी जिंदगी का रुख बदल दिया।
एक बार अवकाश के दौरान पारिवारिक कारणों से वे समय पर ड्यूटी जॉइन नहीं कर सके। यह देरी उनके लिए भारी पड़ गई। विभाग ने बिना किसी विभागीय जांच के उन्हें वर्ष 2018 में सेवा से पृथक कर दिया। यह फैसला न सिर्फ उनके करियर बल्कि उनके परिवार के भविष्य पर भी सवाल खड़ा करने वाला था।
लेकिन उमराव सिंह ठाकुर ने हार नहीं मानी। उन्होंने अधिवक्ता रवि भगत के माध्यम से छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में वर्ष 2019 में याचिका (WPS/10147/2019) दायर की।
यह लड़ाई आसान नहीं थी। लगभग 10 वर्षों तक मामला न्यायालय में चलता रहा। हर तारीख के साथ उम्मीद और निराशा के बीच झूलते हुए उमराव सिंह ठाकुर अपने न्याय की प्रतीक्षा करते रहे।
आखिरकार 07 अगस्त 2025 को न्यायालय ने उनके पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि बिना विभागीय जांच के किसी भी कर्मचारी को सेवा से हटाया नहीं जा सकता और उसे सुनवाई का उचित अवसर मिलना चाहिए।
इस आदेश के पालन में 19 अगस्त 2025 को उमराव सिंह ठाकुर केंद्रीय जेल अंबिकापुर के अधीक्षक के समक्ष उपस्थित हुए और पुनः सेवा में बहाली के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उन्हें फिर भी सेवा में बहाल नहीं किया गया।
इसके बाद उन्होंने न्यायालय की अवमानना की याचिका दायर की। वहीं शासन द्वारा भी इस आदेश के खिलाफ रिट अपील प्रस्तुत की गई।
अंततः 17 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जा रही थी, ने शासन की अपील को खारिज कर दिया।
इस फैसले के साथ ही उमराव सिंह ठाकुर की वर्षों की लड़ाई को न्याय मिला और उनकी सेवा में पुनः बहाली का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन सभी कर्मचारियों के लिए मिसाल है, जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस रखते हैं। उमराव सिंह ठाकुर ने यह साबित कर दिया कि अगर हौसला और धैर्य हो, तो न्याय देर से ही सही, लेकिन जरूर मिलता है।
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