Bilaspur news -"धर्म और राजनीति पर शंकराचार्य का तीखा बयान""सत्तारूढ़ दलों पर लगाए""गंभीर आरोप,,,,
शेख असलम की रिपोर्ट,,,
धर्म और राजनीति पर शंकराचार्य का तीखा बयान, सत्तारूढ़ दलों पर लगाए गंभीर आरोप
बिलासपुर -बिलासपुर मे धर्म और राजनीति को लेकर एक बड़ा और विवादित बयान सामने आया है। अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सत्तारूढ़ दलों पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि उनकी आवाज को दबाने के लिए हिस्ट्रीशीटरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और धार्मिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
शंकराचार्य ने गौ रक्षा के मुद्दे पर सरकारों को घेरते हुए कहा कि वे लंबे समय से इस विषय को उठा रहे हैं, लेकिन सत्ताधारी पार्टियां इस दिशा में कोई गंभीर पहल नहीं कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस मुद्दे का उपयोग किया जाता है, जबकि जमीनी स्तर पर कोई ठोस काम नहीं हो रहा।
उन्होंने आगे कहा कि लगातार सक्रिय रहने और मुखर तरीके से अपनी बात रखने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है और उनकी आवाज को दबाने की कोशिशें हो रही हैं।
सनातन धर्म पर ‘भीतरी खतरे’ की चेतावनी
सनातन धर्म पर टिप्पणी करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि धर्म को बाहरी लोगों से उतना खतरा नहीं है, जितना अंदर मौजूद “कालनेमियों” से है। उनके इस बयान को धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने धर्म के भीतर मौजूद चुनौतियों की ओर इशारा किया।
उत्तर प्रदेश सरकार और योगी आदित्यनाथ पर निशाना
शंकराचार्य ने योगी आदित्यनाथ पर भी सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार की नीयत केवल वोट हासिल करने की है, न कि हिंदुओं के हित में काम करने की।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने 40 दिन का समय दिया था, लेकिन सरकार अपने दावों को साबित नहीं कर पाई। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनके अनुसार सरकार की कथनी और करनी में अंतर है।
यूजीसी कानून पर भी उठाए सवाल
इसके अलावा, शंकराचार्य ने कथित “सवर्ण यूजीसी कानून” को लेकर भी कड़ा विरोध जताया। उन्होंने इसे समाज को बांटने वाला और “राष्ट्रद्रोह” जैसा कदम बताते हुए कहा कि इसे किसी भी स्थिति में लागू नहीं किया जाना चाहिए।
राजनीतिक हलकों में बढ़ी हलचल
शंकराचार्य के इस तीखे बयान के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। वहीं, धार्मिक संगठनों और सामाजिक समूहों की प्रतिक्रियाएं भी इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक चर्चा में ला सकती हैं।
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