Bilaspur news-"विकास की बलिबेदी पर 500 जिंदगियां, न्यायधानी में दम तोड़ती इंसानियत,,,,,

शेख असलम की रिपोर्ट,,,
बिलासपुर का 'लिंगियाडीह कांड': विकास की बलिबेदी पर 500 जिंदगियां, न्यायधानी में दम तोड़ती इंसानियत!


70 दिनों से सड़क पर 'लोकतंत्र का जनाजा': महिलाओं की आंखों में अंगारे, बच्चों का भविष्य दांव पर, आखिर किसकी 'गार्डन वाली सनक' उजाड़ रही गरीबों के आशियाने?
बिलासपुर -छत्तीसगढ़ की न्यायधानी कहे जाने वाले बिलासपुर के लिंगियाडीह क्षेत्र में आज 'न्याय' खुद शर्मिंदा है। यहां विकास का एक ऐसा 'खूनी मॉडल' तैयार किया जा रहा है, जिसकी नींव में गरीबों के आशियाने और मासूमों के सपने दफन करने की तैयारी है। नगर निगम प्रशासन एक गार्डन बनाने की अपनी 'शाही जिद' को पूरा करने के लिए 500 इंसानी जिंदगियों को खुले आसमान के नीचे धकेल चुका है। पिछले 70 दिनों से कड़ाके की ठंड, धूल और धूप के बीच घर की महिलाएं सड़क पर बैठी हैं, लेकिन सत्ता के मद में चूर जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधियों की संवेदनाएं मर चुकी हैं। यह आंदोलन अब केवल घर बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ एक खुला विद्रोह बन चुका है।
सत्ता की कुंभकर्णी नींद और 'शर्मनाक' चुप्पी
हैरानी की बात यह है कि इस 'महा-आंदोलन' को चलते हुए दो महीने से अधिक का समय हो गया है। 1680 घंटों से ज्यादा वक्त बीत चुका है, लेकिन मजाल है कि क्षेत्र के विधायक या किसी शासन के नुमाइंदे ने वहां जाकर उन बिलखती माताओं-बहनों का हाल पूछा हो। क्या प्रशासन किसी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? 

क्या गरीबों के वोट से चुनकर आए जनप्रतिनिधि अब केवल रसूखदारों के 'दरबारी' बनकर रह गए हैं? 

70 दिनों की यह चुप्पी साफ़ चीख-चीख कर कह रही है कि प्रशासन की नजर में 'गरीब की छत' की कीमत उस गार्डन में लगने वाले 'सजावटी पत्थरों' से भी कम है।

कागजी नक्शों की बलि चढ़ती बस्तियां: क्या यही है 'सबका साथ'?

निगम के दफ्तरों में एसी की हवा खाकर नक्शा खींचने वाले अफसरों को शायद यह नहीं पता कि एक घर बनाने में एक गरीब की पूरी उम्र लग जाती है। जिन परिवारों के पास 50-60 साल पुराने सरकारी दस्तावेज, राशन कार्ड और बिजली बिल हैं, उन्हें अचानक 'अतिक्रमणकारी' बता देना न केवल कानूनी धोखाधड़ी है, बल्कि मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है।
जनता के सवाल:
विनाशकारी विकास किसका भला करेगा? जब शहर पहले से ही कंक्रीट का जंगल है और दर्जनों गार्डन बदहाली के आंसू रो रहे हैं, तो बसे-बसाए घरों को उजाड़कर नया गार्डन बनाना कौन सा मास्टरप्लान है?
दोहरा चश्मा क्यों? शहर के रसूखदारों और भू-माफियाओं ने जब सरकारी जमीनों पर महल खड़े किए, तब निगम का बुलडोजर गैरेज में क्यों खड़ा रहता है? 
क्या कानून का सारा डंडा सिर्फ झोपड़ी वालों के लिए है ?
राजनीति की भेंट चढ़ती जनता: आरोप है कि यह वार्ड विपक्षी विचारधारा का गढ़ है, इसलिए इसे जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। क्या सत्ता अब जनता से बदला लेने पर उतारू है?
सड़क पर चूल्हा, आंखों में आंसू और सीने में आग
आंदोलन का नेतृत्व कर रही महिलाओं ने प्रशासन की दोहरी नीति की बखिया उधेड़ दी है। अनिता पाटिल, यशोदा पाटिल और कुंती तिवारी जैसी सैकड़ों महिलाओं का कहना है कि प्रशासन ने बिना किसी ठोस 'पुनर्वास नीति' के उन्हें बेदखली का नोटिस थमा दिया। आज बच्चों की पढ़ाई ठप है, बुजुर्गों का स्वास्थ्य गिर रहा है और घर के भीतर चूल्हा जलने की बजाय सड़क पर आंदोलन की आग धधक रही है।
इस संघर्ष में समाज के हर वर्ग के लोग शामिल हैं। कुंती तिवारी, डॉ. रघु साहू, किरण धूरी, ममता बुनकर, शकुन्तला साहू, और कमला धूरी जैसी महिलाएं दिन-रात मोर्चे पर डटी हैं। उनके साथ चंद्रधर, अजय काले, महेतराम सिंगरौल, और प्रशांत मिश्रा जैसे नागरिक इस तानाशाही के खिलाफ दीवार बनकर खड़े हैं।सूची इतनी लंबी है कि प्रशासन के पास जेलें कम पड़ जाएंगी, लेकिन इनके हौसले कम नहीं होंगे। सखन दरवे, भोला राम साहू, श्रवण दास मानिकपुरी, चतुर सिंह यादव, सिद्धार्थ भारती, और डॉ. अशोक शर्मा जैसे प्रबुद्ध नागरिक भी इस 'अस्तित्व की जंग' में शामिल हो चुके हैं।

निगम प्रशासन को  अब भी जाग जाओ!
लिंगियाडीह का यह मंजर बिलासपुर प्रशासन के माथे पर एक ऐसा कलंक है जिसे इतिहास कभी नहीं धो पाएगा। एक तरफ लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है, दूसरी तरफ जनता का गला घोंटा जा रहा है। अगर समय रहते इन परिवारों के लिए सम्मानजनक पुनर्वास और न्याय की व्यवस्था नहीं की गई, तो यह 'शांतिपूर्ण महा-आंदोलन' एक ऐसी क्रांति का रूप लेगा जो सत्ता की कुर्सी हिलाने की ताकत रखती है।
अंतिम सवाल: क्या बिलासपुर का प्रशासन और सरकार वाकई इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि उसे 500 जिंदगियों की चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं? या फिर इस 'विनाशकारी विकास' के पीछे कोई बड़ा जमीन का खेल चल रहा है?
बड़ी संख्या में उपस्थित 
आंदोलन में प्रमुख रूप से रूपेश साहू, ओंकार साहू, गोपी देवांगन, गोलू देवांगन, सलीम मेमन, रामबाई, राधा साहू, कुमारी निषाद, संतोषी यादव, कुंती प्रजापति, चमेली रजक, जानकी गोड, पिंकी देवांगन, उर्मिला पाटिल, लीला पाटिल, रूपा सरकार, सरस्वती देवांगन, पुष्पा देवांगन, लता देवांगन, राजकुमारी देवांगन, मथुरा सूर्यवंशी, जमुना सूर्यवंशी, सनी अहिरवार, जयकुमार अहिरवार, सोनिया केवट, नंदनी ध्रुव, साधना यादव, सीता साहू, सुशीला साहू, कुमारी यादव, अमेरिका श्रीवास, रूपा देवी, गायत्री देवांगन, जानकी देवांगन, मालती मानिकपुरी, मरजीना बेगम, वंदना डे, सुशीला श्रीवास, सावित्री यादव, और सरिता राजपूत सहित सैकड़ों लोग चट्टान की तरह डटे हुए हैं।

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