Bilaspur news-"पुरुषार्थ की गति बढ़ाने के लिए ‘कारण’ नहीं, ‘निवारणस्वरूप ’ बनें – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

शेख असलम की रिपोर्ट,,,
पुरुषार्थ की गति बढ़ाने के लिए ‘कारण’ नहीं, ‘निवारणस्वरूप ’ बनें – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

 शिव-अनुराग भवन में चल रही पॉजिटिव थिंकिंग की क्लास,,,

बिलासपुर/ किशोर नगर-शिव-अनुराग भवन, राज किशोर में चल रहे पॉजिटिव थिंकिंग क्लास में जीवन की समस्याओं, उनके कारणों और समाधान पर सारगर्भित मार्गदर्शन दिया गया। कार्यक्रम में अव्यक्त महावाक्यों के माध्यम से ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी ने स्पष्ट किया कि जब जीवन में पुरुषार्थ की गति धीमी हो जाती है, तो उसके पीछे कोई न कोई कारण या बहाना अवश्य होता है।

दीदी ने संदेश दिया कि वर्तमान समय की आवश्यकता है कि प्रत्येक आत्मा ‘कारण’ खोजने के बजाय ‘निवारण’ स्वरूप बने और हर समस्या को समाधान में परिवर्तित करे। यही तीव्र पुरुषार्थ का आधार है।

 *स्वयं के निवारण से ही विश्व-कल्याण* 

दीदी ने कहा कि जब तक व्यक्ति स्वयं अपनी कमजोरियों और उलझनों से मुक्त नहीं होगा, तब तक वह दूसरों को मुक्ति का मार्ग नहीं दिखा सकता। एक ‘मास्टर मुक्तिदाता’ वही है, जो पहले स्वयं बंधनों से मुक्त हो और फिर अन्य आत्माओं को भी शांति और सुख की दिशा दे।

आज संसार की अधिकांश आत्माएँ अशांति और दुख से ग्रस्त हैं तथा मुक्ति की पुकार कर रही हैं। ऐसे समय में स्वयं को सशक्त बनाकर दूसरों की सहायता करना ही सच्चा पुरुषार्थ है।

 *आध्यात्मिक खजाने जमा करने की विधि* 

दीदी ने बताया कि खुशी, शांति और शक्ति जैसे आध्यात्मिक खजाने निमित्त भाव और निर्माण भाव से सहज रूप में जमा होते हैं। जिन आत्माओं में ये खजाने प्रकट होते हैं, उनके जीवन में स्वतः ही रूहानी नशा और बेफिक्र बादशाह जैसी स्थिति दिखाई देती है। उनका संकल्प सदा सकारात्मक रहता है कि जो हो रहा है वह अच्छा है और आगे और भी श्रेष्ठ होगा।

 *समाधान की ‘तीन बिंदी’ की चाबी* 

दीदी ने समस्याओं के समाधान हेतु ‘तीन बिंदी’ की विधि पर विशेष जोर दिया—
स्वयं को आत्मा समझना, परमात्मा को याद करना और बीती बातों पर पूर्ण विराम लगाना।

भविष्य के लिए तीन खाते मजबूत करने पर बल

श्रेष्ठ प्रालब्ध के लिए तीन खातों को निरंतर जमा करने की प्रेरणा दी गई—
स्व-पुरुषार्थ का खाता, दुआओं का खाता और निस्वार्थ सेवा से पुण्य का खाता।

अब साधारण नहीं, तीव्र पुरुषार्थ का समय...

अंत में यह स्मरण कराया गया कि संगम युग जमा की बैंक के समान है, जो सीमित समय के लिए खुली है। इसलिए अब साधारण गति से नहीं, बल्कि तीव्र पुरुषार्थ द्वारा उड़ान भरने का समय है। जब व्यक्ति स्वयं निवारण स्वरूप बनेगा, तभी वह अन्य आत्माओं को भी बंधनों से मुक्त कर सकेगा।

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